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सोमवार, 7 अगस्त 2017

उदारात्मा जयदेव जी महाराज।



उदारात्मा जयदेव जी महाराज

पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू
श्रीमद् भगवद् गीता में आता हैः
दुःखेश्वनुद्विमग्नाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरूच्यते।।
                  ʹदुःखों की प्राप्ति में जिसका मन उद्वेगरहित है और सुखों की प्राप्ति में जिसकी स्पृहा दूर हो गयी है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है।ʹ (गीताः 2.56)
                  सुख में आसक्ति नहीं, वाहवाही में आसक्ति नहीं और दुःख में उद्वेग नहीं हो तो हृदय रहेगा शांत। अगर शांत रहने का विचार पक्का रखो तो फिर आपको यदि कोई सतायेगा तो प्रकृति उसको ठीक कर देगी।
                  ʹगीतगोविंदʹ के कर्त्ता थे जयदेव जी। उनके पिता जब चल बसे तब ब्याजखोर आदमी ने जयदेव जी से कहाः तेरे पिता जी ने हमसे बहुत कर्ज लिया है।
                  जयदेवजीः पिता संपत्ति तो ज्यादा छोड़ नहीं गये हैं। एक छोटा सा घर है जिसमें रहकर भगवान का भजन करता हूँ। आमदनी तो है नहीं, कमाऊँगा तब दे दूँगा।
                  पिता ने तो लिये थे कुछ गिने-गिनाये रूपये किन्तु ब्याजखोर ने बदमाशी करके, ब्याज चढ़ाकर उसका पूरा मकान ले लेने के कागजात बनवा लिये। फिर जयदेव जी से कहाः अगर तुम अपने पिता का कर्जा नहीं चुका सकते तो अपना मकान हमारे हवाले कर दो और इन कागजों पर हस्ताक्षर कर दो।
                  जयदेव जी ने हस्ताक्षर कर दिये। ब्याजखोर ने मकान पर कब्जा कर लिया और जयदेव जी से कहाः अब तुम बाहर निकलो। यह मकान मेरा हो गया।
जयदेवजीः ठीक है भाई ! मैं निकल जाता हूँ। जैसी भगवान की मर्जी।
                  जयदेव जी तो हरिनाम का जप करते-करते घर छोड़कर बाहर निकल गये। जयदेव जी जा रहे थे, उस समय वह ब्याजखोर भी साथ में था। इतने में उसके नौकर दौड़ते-दौड़ते आये और बोलेः घर में आग लग गयी है।यह सुनकर ब्याजखोर घबरा गया।
तब जयदेवजी बोलेः चिन्ता मत करो।
                  जयदेवजी भगवान का नाम लेते हुए उस घर में घुसे तो आग शांत हो गयी। जयदेव जी पुनः बाहर निकले तो आग पुनः लग गयी।
                  यह देखकर उस ब्याजखोर का मन बदल गया किः ʹअरे ! मैंने जयदेव को सताया है। इसके पिता ने तो गिने-गिनाये रूपये लिये थे लेकिन मैंने जुल्म करके इसका पूरा मकान हथिया लिया फिर भी यह शांत रहा। किन्तु विधाता से नहीं सहा गया इसीलिए घर में आग लगी है….ʹ ब्याजखोर ने जयदेवजी के पैर पकड़े और प्रार्थना करके मकान वापस देते हुए कहाः अब आप भजन-चिंतन करें। आपके जीवन का निर्वाह भी मैं करूँगा।
                  जयदेव जी ने कहाः तुम्हारे सहारे मेरा जन्म नहीं हुआ है। जिसने मुझे जन्म दिया है, वही मेरा निर्वाह करेगा।
                  कुछ समय के बाद जयदेवजी जगन्नाथपुरी के लिए रवाना हुए। मार्ग में भूख लगने पर सत्तू भिगोकर खा लेते। मार्ग में एक ऐसा स्थल भी आया कि न पीने को पानी मिले न खाने को भोजन। नंगे पैरऊपर धूपपास में एक भी पैसा नहीं…. ऐसी स्थिति में चलते-चलते जयदेव जी गिर कर बेहोश हो गये।
                  इतने में एक ग्वाला आया। उसने मुँह पर पानी छींटा तो बेहोशी दूर हो गयी। फिर उसने खाने को फल दिये, अमृत जैसा पानी पिलाया और बोलाः आपको जगन्नाथपुरी जाना है न ? मुझे भी वहीं जाना है। चलो, मैं आपको छोड़ देता हूँ।
                  ग्वाला के वेश में भगवान उसे जगन्नाथपुरी तक छोड़ने आये। जयदेव को हुआ किः यह अनजान ग्वालारोज मुझे खाने का ला देता था, इसके साथ यात्रा बड़ी सुखद रही। जीव का तो ऐसा स्वभाव नहीं होता कि किसी अपरिचित के ऊपर इतनी दया करे। ये या तो महात्मा हैं या परमात्मा हैं।ʹ आखिर उनसे रहा न गया और पूछ बैठेः हे ग्वाला ! सच-सच बताओ कि तुम कौन हो ?”
ग्वालाः मुझे जो जैसा मान ले, मैं  वही हूँ।
                  जयदेव जी को समझते देर न लगी किः ʹहो न हो, यही मेरे प्रभु हैं।ʹ ज्यों-ही जयदेव जी पैर पकड़ने को गये तो भगवान छटक गये और बोलेः अभी कइयों को तीर्थ में पहुँचाना है, जयदेव !
                  ऐसा कहकर प्रभु अन्तर्धान हो गये। फिर जयदेव कई वर्षों तक जगन्नाथपुरी में रहे। भिक्षा माँगकर खा लेते और भगवान का भजन करते।
                  जगन्नाथपुरी में ही सुशील नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसको एक कन्या थी। वह 15 साल की हो चुकी थी। एक रात्रि को उस ब्राह्मण दम्पत्ति को स्वप्न आया जिसमें भगवान जगन्नाथ ने दर्शन देते हुए कहाः पेड़ के नीचे जो जयदेव बैठा है न, उसे अपनी कन्या का दान कर दो।
                  दूसरे दिन सुबह ब्राह्मण दम्पत्ति पहुँचे अपनी कन्या को लेकर जयदेव जी के पास और कन्यादान स्वीकार करने का आग्रह करने लगे। तब जयदेव जी बोलेः मैं अपना घर भी छोड़कर आया हूँ, कमाता भी नहीं हूँ। मैं एक गरीब ब्राह्मण…. मेरे पास कुछ भी नहीं है तो भला तुम्हारी कन्या का निर्वाह कैसे कर सकूँगा ?”
                  ब्राह्मणः हे विप्र ! चाहे आपके पास कुछ भी न हो, भले एक पेड़ के नीचे बैठे हो लेकिन हमें तो भगवान ने स्वप्न में आज्ञा दी है इसलिए यह कन्या हम आपको ही अर्पण करेंगे।
                  जयदेव जी के बहुत मना करने पर भी सुशील ब्राह्मण ने कन्यादान कर दिया। वह कन्या भी बड़ी सुशीला थी। उसने अपने पति की भगवद् भक्ति में कोई कमी न आने दी। बड़े प्रेम से भोजन बनाकर भगवान को भोग लगाती, पति को खिलाती, फिर स्वयं खाती। पति की सेवा करते-करते उसमें भी पातिव्रत्य का अनुपम बल आ गया।
                  घूमते-घामते जयदेव जी ने पुनः अपने गाँव वापस आये। कुछ समय के अंतराल से उन्हें पुनः जगन्नाथपुरी जाने  का मन हुआ। तब तक गीतगोविंद की रचना हो चुकी थी एवं उन्होंने काफी प्रसिद्धि पा ली थी। जब वे एक गाँव में पहुँचे तब गाँव वालों ने उन्हें पहचान लिया। सत्संग के बाद जब वे विदा होने लगे तो गाँववालों ने उन्हें स्वर्ण मुद्राएँ भेंट दीं।
                  जयदेवजी धन कमर में बाँधकर वहाँ से रवाना हुए। जंगल का रास्ता था। जिस गाँव से जयदेव जी सत्संग करके आ रहे थे, उस गाँव के चार आदमियों की नज़र जयदेव जी पर थी। बुरी नीयत थी उनकी। जरूरी नहीं कि सत्संग में सभी सज्जन ही आयें। उन चार आदमियों ने, जो वास्तव में डाकू ही थे, जयदेव जी का पीछा किया और जयदेवजी की रकम छीनकर, उनके हाथ पैर की उँगलियाँ तोड़कर उन्हें कुएँ में धकेल दिया ताकि जयदेवजी कहीं जा न सकें। डाकुओं को भय था कि यदि लोगों को पता चलेगा तो वे राजा से कहकर उन्हें पकड़वा देंगे और हमें मृत्युदंड मिल जायेगा।
                  जयदेवजी फिर भी इतने शांत और मस्त थे कि कुएँ में पड़े-पड़े ही गाने लगेः वाह प्रभु ! तेरी लीला अपरंपार है ! प्रभु ! तेरी माया अपरंपार है ! सुख आया और गया, दुःख आया है वह भी जायेगा, लेकिन तू तो सदा हमारे साथ है।दुःख के प्रसंग में भी उन्होंने अपना सुखद भगवद् भाव बना लिया।
                  इतने में गौडेश्वर के राजा लक्ष्मणसेन वहाँ से गुजरे। उन्हें लगा कि ʹकुएँ में से मधुर आवाज आ रही है और यह आवाज जयदेवजी की लगती है।ʹ अंदर झाँककर देखा तो जयदेवजी ही कुएँ में बँधे पड़े हैं। राजा ने अपने सैनिकों को उतारा कुएँ में और जयदेवजी को निकलवाया। बाहर आने पर राजा ने पूछाः जयदेवजी ! आपकी यह हालत किसने की ?”
जयदेवजीः महाराज ! यह मत पूछो।
                  राजाः नहीं नहींबता दो, हम उनको ठीक कर देंगे। हम चारों और सिपाही भेजकर उऩ्हें पकड़वायेंगे। आपको दुःख देने वालों की खबर ले लेंगे।
                  जयदेवजीः खबर लेनी ही है तो अपनी खबर ले लें कि हम कौन हैं ? कहाँ से आये हैं ? अपना स्वरूप क्या है ? यह खबर लेने के लिए ही हमारा जन्म हुआ है। दूसरों की खबर कब तक लेंगे, राजन् ! भूल जाइये।
                  राजा ने बहुत आग्रह किया फिर भी जयदेव जी अडिग रहे और उन्होंने नाम नहीं बताया। यह देखकर राजा की श्रद्धा और भी बढ़ गयी। उसने जयदेवजी को अपना गुरु बना लिया और उन्हें पंचरत्न सभा का अध्यक्ष बना दिया। कुछ समय बाद जयदेवजी की अध्यक्षता में एक ज्ञान सम्मेलन का आयोजन किया जिसमें देश-देशान्तर से कई साधु-संन्यासी, विद्वान, पंडित आदि आये।

                  उन डाकूओं ने सोचा कि ʹएक जयदेव को लूटने से हमें इतना खजाना मिल गया तो इस सम्मेलन में तो कई साधू एकत्रित होंगे। उन साधुओं के बीच जाना हो तो साधु के कपड़े पहनना ठीक रहेगा।ʹ वे चार डाकू साधु के वेश में पहुँचे राजदरबार में।
                  उस सभा में साधुओं का तो सत्कार होता था। जहाँ साधुओं का सत्कार होता था वहाँ पहुँचने पर डाकू देखकर स्तब्ध रह गयेः अरे ! जिसका धन छीनकर हाथ-पैर बाँधकर हमने कुएँ में फेंका था वही आज राजा से भी ऊँचे आसन पर बैठा है ! अब तो हमारी खैर नहीं। क्या करें ? वापस भी नहीं जा सकते और आगे जाना खतरे से खाली नहीं है….”
                  इतने में जयदेव जी की नजर उन साधुवेशधारी डाकुओं पर पड़ी। उनकी ओर निर्देश करते हुए वे राजा से बोलेः राजन् ! ये हमारे चार मित्र हैं। इनका अच्छी तरह से स्वागत कीजिये।
                  अब तो वे डाकू भाग भी नहीं सकते थे। उन्हें आगे ही आना पड़ा। वे चारों काँपने लगे।
                  इतने में जयदेवजी ने कहाः राजन् ! आप मेरा सत्कार करके जो भेंट-पूजा देना चाहते हैं वह मैं तो नहीं लेना चाहता हूँ, मेरे बदले में इन्हीं को दे दीजिये।
                  डाकुओं को हुआ कि ऐसा कहकर जयदेव जी हमारी पोल खोल देंगे और हमें शूली पर चढ़ना पड़ेगा।
                  किन्तु जयदेवजी के मन में उनके लिए सदभावना थी। राजा ने बड़े सत्कार से चाँदी के बर्तन, स्वर्ण-मुद्राएँ, वस्त्रादि प्रदान किये। जब वे विदा होने लगे तो राजा ने सैनिकों से कहाः ये चार महात्मा जयदेव जी के पुराने मित्र हैं। इन्हें जरा गाँव के बाहर जंगल पार करवाकर उनके गाँव तक पहुँचा दो।
                  सैनिक एवं वजीर आदि उन साधुवेशधारी डाकुओं को विदा करने गये। जंगल में वजीर ने पूछाः जयदेवजी के पास इतने बड़े साधु आये, बड़े-बड़े संन्यासी आये फिर भी इतना सम्मान किसी का भी नहीं हुआ, जितना आपका हुआ। अतः आप सच बताइये कि जयदेव जी आपके क्या लगते हैं ?”
                  डाकू तो डाकू थे। उन्होंने सोचाः अगर सच बता देंगे तो मुसीबत आयेगी।हकीकत में सत्य बताने से मुसीबत नहीं आती है। थोड़ी बहुत आती हुई दिखती है तो पाप कटते हैं।
                  साधुवेशधारी उन डाकुओं ने कहाः जयदेव तो हमारे गाँव के हैं। वे हमारे बचपन के साथी हैं। हम एक साथ हमारे नगर के राजा साहब के यहाँ जासूसी का काम करते थे, लेकिन उन्होंने तो राजा की संपत्ति हड़प कर ली। रानी पर उनकी बुरी नजर थी इसलिए राजा ने उनको मारकर कुएँ में डाल देने का आदेश हमें दिया था लेकिन ये हमारे पुराने मित्र थे। हमको दया आ गयी इसलिए हमने उनको मारा नहीं बल्कि हाथ-पैर की उँगलियाँ काटकर उन्हें जिंदा ही कुएँ में फएंक दिया और साबिती के रूप में उनकी काटी हुई उँगलियाँ राजा के पास ले गये।
                  इतना ही कहना था और उस परमात्मा से सहा न गया, जहाँ वे चारों खड़े थे वहीं धरती फट गयी और चारों जमीन में बुरी तरह दब मरे।
                  उन लोगों ने झूठ कहा लेकिन सृष्टिकर्ता से सहन नहीं हुआ क्योंकि जो शांत है, परहितपरायण है, उसका थोड़ा भी अगर कोई बिगाड़ता है या धोखा करता है तो ईश्वर से सहन नहीं होता है।
                  चारों को नष्ट होते देखकर वजीर चकित हो गया। उनको दिया हुआ सामान वापस लाया और राजा के चरणों में रखते हुए पूरी घटना सुना दी।
                  तब राजा ने पैर पकड़े जयदेवजी के और बोलेः जयदेव जी अब तो सच-सच बताइये ! आप तो कह रहे थे कि ʹये मेरे पुराने मित्र हैंʹ और वे आपके लिए ऐसा कह रहे थे। उनकी बात सुनकर सृष्टिकर्ता से सहन नहीं हुआ और धरती फट गयी। चारों उसमें दब मरे। आप सच बताइये कि वे कौन थे ?”
                  जयदेवजीः महाराज ! आपने बहुत आग्रह करके पूछा था तब भी मैंने नहीं बताया था। मैंने सोचा था कि उनको पैसे की कमी है इसलिए डाका डालते हैं और मुझे भी लूटा है। अगर उनका धन मिल जायेगा तो उनका स्वभाव सुधर जायेगा ऐसा सोचकर मैंने आपसे उन्हें धन दिलवाया। लेकिन वे नहीं बदले, जिसके परिणामस्वरूप भगवान ने उन्हें बड़ी खतरनाक सजा दी।
                  जो व्यक्ति उदारात्मा है, प्राणीमात्र का हितैषी है उससे कोई अन्याय करे, उसका अहित करे तो वह भले सहन कर ले किन्तु सृष्टिकर्ता देर-सबेर उसे अपराध का दंड देता ही है।
संत का निंदक महाहत्यारा।
संत का निंदक परमेश्वर मारा।।
संत के निंदक की पूजे न आस।
नानक ! संत का निंदक सदा निराश।।
                  आप निश्चिंत रहो, शांत रहो, आनंदित रहो तो आपका तो मंगल होगा लेकिन अगर आपका कोई अमंगल करेगा तो देर-सबेर प्रकृति उसका स्वभाव बदल देगी, वह आपके अनुकूल हो जायेगा। अगर वह आपके अनुकूल नहीं होता तो फिर चौदह भुवनों में भी उसे शांति नहीं मिलेगी और जिसके पास शांति नहीं है, फिर उसके पास बचा ही क्या ? उसका तो सर्वनाश है। दिन का चैन नहीं, रात की नींद नहीं, हृदय में शांति नहीं तो फिर और जो कुछ भी है, उसकी कीमत भी क्या ?
                  पद्मपुराण में आता है किः ʹजिसके पास क्षमा है, उसने सब व्रत कर लिये। जिसके पास संयम है, उसने सब तीर्थों में स्नान कर लिया। जिसके पास दया है, उसने सब जप कर लिये। जिसके पास संतोष है, उसने सब धन कमा लिया।ʹ
जयदेव आध्यात्मिक धन के धनी थे। भागवत के श्रोता-वक्ता जानते हैं गीत-गोविंद के कर्त्ता जयदेवजी का नाम।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 1997, पृष्ठ संख्या 21,22,23,24 अंक 56
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