शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

अखाड़ा परिषद द्वारा जारी की गयी सूची हुई खारिज।

अखाड़ा परिषद द्वारा जारी की गयी सूची हुई खारिज

अखाड़ा परिषद द्वारा जारी की गयी सूची हुई खारिज
पूज्य बापूजी का नाम जोड़ने की संतों ने की भर्त्सना

हाल ही में अखाड़ा परिषद द्वारा एक सूची जारी कर कहा गया कि ये संत फर्जी हैं । इस सूची में पूज्य बापूजी का भी नाम था । अखाड़ा परिषद के इस कृत्य की चहुँओर आलोचना हुई । विभिन्न मत-पंथ, सम्प्रदायों के संतों ने इसे ईर्ष्या-द्वेषपूर्ण, अनधिकार, असंवैधानिक ठहराते हुए इसके प्रति सख्त विरोध जताया एवं इसे खारिज किया ।
17 सितम्बर 2017 को जंतर-मंतर (दिल्ली) पर संत महासभा के तत्त्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में अनेक संत-महात्मा व विभिन्न हिन्दू संगठनों के प्रतिनिधि एकत्र हुए और अखाड़ा परिषद की 10-9-17 की कथित फर्जी संतों की सूची पर चिंतन-मनन के बाद यह अंतिम निर्णय लिया गया कि उक्त सूची दुर्भावना एवं अपनी नाकामियों को छुपाने के उद्देश्य से अखाड़ा परिषद द्वारा जारी की गयी थी, जो धर्मसम्मत और संवैधानिक भी नहीं है । इससे न सिर्फ हिन्दुत्व को नुकसान होगा बल्कि धर्म-परिवर्तन को भी बल मिलेगा । अतः कथित फर्जी सूची को संत महासभा द्वारा संतों एवं जनता की उपस्थिति में तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाता है ।
उपरोक्त प्रस्ताव पारित होने के बाद संत महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणिजी महाराज ने कहा :अखाड़ा परिषद का अस्तित्व सन् 1956 में आया । क्या उसके पहले संत नहीं थे ? अखाड़ा परिषद का रजिस्ट्रेशन कब हुआ है ? वह पहले अपना रजिस्ट्रेशन नम्बर तो बताये, फिर पता चल जायेगा कि फर्जी हम हैं कि तुम हो ! तुम गाँजा-चिलम खींचते हो, अरे वाह ! तुम तो संत हो गये भाई ! और जिन्होंने लाखों लोगों के व्यसन छुड़वाये उन्हें तुम फर्जी बोलते हो !
अखाड़ा परिषद को यह सुझाव दिया जाता है कि जिसके घर शीशे के होते हैं, वे पत्थर के घरवालों पर ईंट नहीं फेंकते । अखाड़ा परिषद ने अगर दोबारा संतों के खिलाफ ‘फर्जी’ शब्द का प्रयोग किया तो संत महासभा उनको कानूनी तौर पर अदालत में खींच के लायेगी । 
एक तो तुमने पैसा लेकर धार्मिक भ्रष्टाचार किया और फिर अपनी कमियों को छुपाने के लिए ऐसी सूची जारी कर दी । तुमने साबित कर दिया कि तुम भ्रष्ट हो ।
इससे समाज में धार्मिक मर्यादा खत्म हो रही है । पहले अपना सुधार करें । ईर्ष्यार्-द्वेषवश जानबूझकर हम किसीको फर्जी घोषित कर दें तो इसका परिणाम तो बहुत बुरा होगा । इसलिए जरूरी है कि ऐसे कोई गलत निर्णय लेता है तो हम उसका बहिष्कार करें । षड्यंत्र करके आदरणीय  बापूजी को  फँसाया गया है तो यह नहीं कि अखाड़ेवालो ! तुम बचे रहोगे ।
2014 में बड़ा कुछ सपना सँजोकर हम लोगों ने केन्द्र में सरकार बनवायी । पूरे देश में समर्थन किया । अब सरकार बन गयी । 
जब देश को सींचना था खून से, तो सींचा संतों ने ।
और जब चमन में बहार आयी
तो कहते हो तेरा कोई काम नहीं ।।
अब देखो, संत को तो जेल में डाल दिया जा रहा है, 4 साल से जमानत नहीं मिल रही है । हमारे संतों को अगर जेल से बाहर नहीं निकाला गया तो संतों के खिलाफ राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्रों को बेनकाब करने के लिए पूरे देश में संत महासभा द्वारा ‘संत बचाओ’ यात्रा निकाली जायेगी ।
एक संत जेल में हैं मतलब हमारी संस्कृति जेल में है । उन संत की रक्षा में, उस संस्कृति को बचाने में अगर तुम बहानेबाजी करते हो तो संतजन तो छोड़ दो, परमात्मा भी तुम्हें निश्चितरूप से माफ नहीं करेंगे । 
अनंतश्री विभूषित राजगुरु स्वामी दयानंद सरस्वतीजी उर्फ पाताल बाबा, अध्यक्ष, ‘गंगा बचाओ’ आंदोलन तथा पीठाधीश्वर, अखिल भारतीय मांत्रिक महासभा : आशारामजी बापू जैसे संत को दुष्ट मानसिकतावालों ने कारागार में डलवा दिया । हमारे बापू लाखों-करोड़ों के हृदयों में हैं । भारतवर्ष के मुख्य न्यायाधीश से प्रार्थना करूँगा कि संत को रिहा कीजिये और फिर देखिये यह देश कितना आगे बढ़ता है ! 
स्वामी चिन्मयानंदजी महाराज, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, संत महासभा : कोई भी उठकर हिन्दुस्तान के संतों को ‘फर्जी’ का प्रमाणपत्र दे रहे हैं, यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है । इनमें कई तो ऐसे हैं कि लाखों रुपये एेंठते हैं और फिर महामंडलेश्वर, मंडलेश्वर बनाते हैं । मुझे भी कहा गया था कि ‘स्वामीजी ! आप 4 लाख रुपये दे दो तो आपको महामंडलेश्वर बनायेंगे ।’ मैंने कहा : ‘‘मैं 4 लाख क्या 4 पैसे भी नहीं दूँगा ।’’ मैं एक आह्वान करता हूँ सच्चे संतों को भी फर्जी कहनेवाले अखाड़ा परिषदवालों से कि ‘आप अपनी औकात में रहें ।’ इनको अपने छेद देखने की जरूरत है ।
महंत कैलाशनाथ हठयोगीजी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय संत एकता आंदोलन परिषद : अखाड़ा परिषद के पदाधिकारियों ने अपने संतों पर ही वार करना शुरू कर दिया है । यह सही नहीं है । संत आशारामजी बापू जैसे संत ‘न भूतो न भविष्यति’ होते हैं । 
श्री दाताशाहजी महाराज, भगवान वाल्मीकि आश्रम सेवादल, लुधियाना; प्रांतीय अध्यक्ष, संत महासभा एवं उपाध्यक्ष, राष्ट्रीय संत महासंघ : संत आशारामजी बापू के साथ जो किया जा रहा है वह गलत है । हम हर तरह से बापूजी के साथ हैं ।
श्री घनश्यामानंदजी, अध्यक्ष, वैदिक डिवाइन एसोसिएशन : परम पूज्य बापूजी संतशिरोमणि हैं । उन्होंने देश को बहुत कुछ दिया है । बापूजी का अपमान वास्तव में हिन्दुत्व का अपमान है ।
श्री सुनील गुप्ताजी, उपाध्यक्ष, लोनी समिति, हिन्दू एकता मंच : जो संत अपना पूरा जीवनकाल देश के लिए न्योछावर कर देते हैं, जिनकी बदौलत भारत महान है, जिनके कारण मानवता है, उनके लिए ऐसा अनर्गल दुष्प्रचार गलत है ।
स्वामी कल्याणदेवजी महाराज, संयोजक, संत महासभा, हरियाणा : ये अखाड़ा परिषद के खुद फर्जी लोग हैं और जबरदस्ती अपने-आपको अध्यक्ष कह रहे हैं । जिनका कोई अस्तित्व नहीं है वे सर्टिफिकेट दे रहे हैं । ऐसे सर्टिफिकेट को कोई नहीं मानता । न हमारा संत-समाज मानता है और न आम जनता को मानना चाहिए । बापूजी सच्चे संत हैं ।
श्री ब्रह्मप्रकाशजी महाराज : संत आशारामजी बापू को अनुचित ढंग से जेल में डाला गया है । हिन्दुओं को, संतों को बदनाम करने का यह षड्यंत्र है । अखाड़ा परिषद ने एक गलत सूची जारी करके कहा कि ये फर्जी बाबा हैं पर वे खुद ही गलत हैं । यह सब फर्जी काम है । संत आशारामजी बापू पिछले 50 वर्षों से समाजोत्थान के सेवाकार्य कर रहे हैं । हम सरकार से माँग करते हैं कि बापू आशारामजी को जल्द-से-जल्द रिहा किया जाय ।
प्रवक्ता नीलम दुबे : देश को खत्म करने से पहले उसकी संस्कृति पर, संतों पर वार किया जाता है । आज हिन्दू धर्म को खत्म करने के जो दुष्प्रयास किये जा रहे हैं, सभी हिन्दुओं को एकजुट होकर उनका मुकाबला करना चाहिए न कि अपने ही लोगों पर छींटाकशी करके आपसी मतभेद पैदा करना चाहिए । पूज्य बापूजी भारतीय संस्कृति के महान संत हैं । उन्हें किसीके प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है । 
श्री सत्पाल मलहोत्राजी, हिन्दू हेल्प लाइन, दिल्ली : बापूजी को जेल में क्यों बंद किया गया है ? बापूजी धर्मांतरित लोगों की घर-वापसी का कार्य बहुत तेजी से कर रहे थे । उन्होंने ओड़िशा आदि अनेक राज्यों के आदिवासी क्षेत्रों के लाखों परिवार, जो सनातन हिन्दू धर्म छोड़ के धर्मांतरित हो गये थे, उनकी घर-वापसी करवायी और इसका बापूजी को जुर्माना देना पड़ रहा है कि वे पिछले 4 साल से जेल में हैं ।
उस वक्त की सरकार ने मिशनरियों के इशारे पर बापूजी को झूठे मुकदमे में फँसाकर जेल में बंद किया । इस वक्त देश के अंदर एक हिन्दू सरकार है । और अगर वह हिन्दू सरकार है तो जिस तरह से साध्वी प्रज्ञाजी के केस की दोबारा जाँच हुई और उन्हें निर्दोष पाया गया, इसी तरह से बापूजी के लिए भी निष्पक्ष जाँच हो । बापूजी निर्दोष हैं और निर्दोष ही साबित होंगे । उन्हें शीघ्र सम्मानपूर्वक रिहा किया जाय ।
श्री रामाभाई : जो लोग लिस्टें जारी कर कहते हैं कि ये फर्जी संत हैं... क्या ऐसी लिस्टें जारी करनेवालों को पता है कि ‘संत’ किन्हें कहते हैं ?
जिनकी अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं का अंत हो गया है, जिनके लिए ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ अर्थात् पूरा विश्व ही अपने परिवारतुल्य हो गया है, वे ‘संत’ कहलाते हैं । जो लोगों को धर्मच्युत होने से बचायें, धर्म की रक्षा करें, धर्म की सुवास अपने जीवन से महकायें और लोगों का जीवन सही मार्ग पर मोड़ने का सामर्थ्य रखें वे संत हैं । ये सभी सद्गुण पूज्य बापूजी के जीवन में स्पष्टरूप से देखने को मिलते हैं इसलिए बापूजी की ‘संत’ उपाधि शास्त्रप्रदत्त है । यह बापूजी के सद्गुरु भगवत्पाद स्वामी लीलाशाहजी महाराज द्वारा प्रदत्त है । बापूजी का संतत्व समाज के लाखों लोगों के हृदयों में है । इसे कोई परिषद तो क्या, कोई भी नहीं हटा सकता । जिन्होंने भी ऐसा व्यर्थ का दुष्प्रयास किया वे अपनी ही इज्जत घटा रहे हैं । कोई सूरज पर कीचड़ उछाले तो क्या होगा ? ब्रह्मनिष्ठ संत श्री आशारामजी बापू अध्यात्म-क्षितिज के सूर्य थे, हैं और रहेंगे । पूज्य बापूजी एवं श्री नारायण साँईंजी का नाम ऐसी सूची में जोड़ना बिल्कुल निंदनीय कृत्य है ।
इस कार्यक्रम में उपरोक्त महानुभावों एवं संगठन प्रमुखों के अलावा महंत श्री ओमनाथजी महाराज, योगी गंगानाथजी महाराज, श्री देवजी महाराज (हरिद्वार), श्री हरिओमजी वशिष्ठ (हरिओम शरण संस्थान, दिल्ली), संत साधुनाथ ज्वालाजी (हि.प्र.), महंत राघवेन्द्रजी महाराज, मौनी बाबा (महंत डॉ. दलीपनाथजी, गोरखनाथ आश्रम, दिल्ली), साध्वी मंजूदेवी, बमबम ठाकुर (यूथ सनातन सेवा संघ) आदि उपस्थित रहे ।
अखाड़ा परिषद द्वारा जारी की गयी संतों की सूची खारिज करने, संतों के खिलाफ चल रहे मीडिया ट्रायल को रोकने एवं राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्रों को उजागर करने, गौरक्षा कानून बनवाने आदि विषयों को लेकर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्रीजी आदि के नाम ज्ञापन दिया गया ।
उपरोक्त संतों एवं संगठन प्रमुखों के संगठनों के अलावा अखिल भारतीय श्री योग वेदांत सेवा समिति, युवा सेवा संघ, महिला उत्थान मंडल, हिन्दू यूनाइटेड फ्रंट, शक्ति सेना, धर्म रक्षा मंच, भारत जागृति मोर्चा, युवा हितकारिणी संघ, अखिल भारतीय नारी रक्षा मंच, महिला-शक्ति उत्थान मंडल, धर्म रक्षा दल, संस्कृति रक्षक संघ, स्वामी विवेकानंद युवा जागृति मंच आदि संगठनों ने भी उपरोक्त प्रस्ताव का समर्थन किया ।

वीरांगना का शौर्य और छत्रपति का मातृभाव।


वीरांगना का शौर्य और छत्रपति का मातृभाव।

      दक्षिण भारत का एक छोटा-सा राज्य था बेल्लारी । उसका शासक कोई वीर पुरुष नहीं बल्कि शौर्य की प्रतिमा विधवा नारी मलबाई देसाई थीं । छत्रपति शिवाजी की सेना ने बेल्लारी पर चढ़ाई की । शिवाजी की विशाल सेना का सामना वहाँ के मुट्ठीभर सैनिक कैसे करते ! किंतु बेल्लारी के सैनिक खूब लड़े । छत्रपति ने उन शूरों के शौर्य को देख के उनकी खूब प्रशंसा की ।
      पर बेल्लारी की सेना की पराजय तो पहले से निश्चित थी । वह हार गयी और मलबाई को बंदी बनाकर सम्मानपूर्वक छत्रपति शिवाजी के सामने लाया गया । इस सम्मान से मलबाई प्रसन्न न थीं ।
      बाई ने शिवाजी से कहा : ‘‘एक नारी होने के कारण मेरा यह परिहास क्यों किया जा रहा है ? छत्रपति ! तुम स्वतंत्र हो और थोड़ी देर पहले मैं भी स्वतंत्र थी । मैंने स्वतंत्रता के लिए पूरी शक्ति से संग्राम किया है किंतु तुमसे शक्ति कम होने के कारण मैं पराजित हुई । अतः तुम्हें मेरा अपमान तो नहीं करना चाहिए । तुम्हारे लोगों का यह आदर-दान का अभिनय अपमान नहीं तो और क्या है ? मैं शत्रु हूँ तुम्हारी, तुम मुझे मृत्युदंड दो ।’’
      छत्रपति सिंहासन से उठे, उन्होंने हाथ जोड़े : ‘‘आप परतंत्र नहीं हैं; बेल्लारी स्वतंत्र था, स्वतंत्र है । मैं आपका शत्रु नहीं हूँ, पुत्र हूँ । अपनी तेजस्विनी माता जीजाबाई की मृत्यु के बाद मैं मातृहीन हो गया हूँ । मुझे आपमें अपनी माता की वही तेजोमयी मूर्ति के दर्शन होते हैं । आप मुझे अपना पुत्र स्वीकार कर लें ।’’
      मलबाई के नेत्र भर आये । वे गद्गद कंठ से बोलीं : ‘‘छत्रपति ! तुम सचमुच छत्रपति हो । हिन्दू धर्म के तुम रक्षक हो और भारत के गौरव हो । बेल्लारी की शक्ति तुम्हारी सदा सहायक रहेगी ।’’
      महाराष्ट्र और बेल्लारी के सैनिक भी जब छत्रपति शिवाजी महाराज की जय !बोल रहे थे, तब स्वयं छत्रपति ने उद्घोष किया, ‘माता मलबाई की जय !
      हिन्दू एकता एवं हिन्दवी स्वराज्य के लिए जीवन अर्पण करनेवाले भारत के वीर सपूत छत्रपति शिवाजी महाराज ने मलबाई का राज्य कभी अंग्रेजों के अधीन नहीं हो सकताइसका विश्वास होते ही उन्हें स्वतंत्र रहने देने का उद्घोष किया और हिन्दू-एकता और संस्कृति-रक्षा का स्वर्णिम इतिहास रचा ।
      धन्य हैं मलबाई जैसी संस्कृतिनिष्ठ वीरांगना, जिन्होंने अपने देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी और धन्य हैं छत्रपति शिवाजी जैसे संस्कृति-प्रेमी शासक, जिन्होंने व्यक्तिगत स्वार्थरहितता का परिचय देते हुए अपने देश, धर्म व संस्कृति को महत्त्व देकर मलबाई को हराने के बाद भी सम्मानित किया और बंदी नहीं बनाया बल्कि उनके हृदय की स्वतंत्रता की जागृत ज्योति देखकर, उनकी राष्ट्रनिष्ठा देख के उन्हें स्वतंत्र ही बने रहने दिया ।

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Calender 2018













संत – राष्ट्र के प्राणाधार।

संत राष्ट्र के प्राणाधार।
      ईरानियों और तुर्कियों के बीच युद्ध चालू हुआ था । वे आपस में भिडे तो ऐसे भिडे कि कोई निर्णायक मोड नहीं आ रहा था । तुर्कियों को ईरानियों से लोहा लेना बडा भारी पड रहा था । इतने में ईरान के सूफी संत फरीदुद्दीन अत्तार युद्ध की जगह से गुजरे तो तुर्कियों ने उन्हें जासूसी के शक में पकड लिया । अब ईरान के संत हैं तो गुस्से में द्वेषपूर्ण निर्णय किया कि इन्हें मृत्युदंड दिया जायेगा, देशद्रोही आदमी हैं । ईरान के अमीरों ने सुना तो कहला के भेजा : ‘‘इन संत के वजन की बराबरी के हीरे-जवाहरात तौल के ले लो लेकिन हमारे देश के संत को हमारी आँखों से ओझल न करो ।
      तुर्क-सुल्तान : ‘‘हूँह... !
      फिर ईरान के शाह ने कहा : ‘‘हीरे-जवाहरात कम लगें तो यह पूरा ईरान का राज्य ले लो लेकिन हमारे देश के प्यारे संत को फाँसी मत दो ।
      ‘‘आखिर इनमें क्या है ? देखने में तो ये एक इंसान दिखते हैं !
      ‘‘इंसान तो दिखते हैं लेकिन रब से मिलानेवाले ये महापुरुष हैं । ये चले गये तो असलियत के बारे में अँधेरा हो जायेगा । ब्रह्मज्ञानी संत का आदर मानवता का आदर है, इंसानियत का आदर है, मनुष्य के ज्ञान का आदर है, विकास का आदर है । ऐसे ब्रह्मज्ञानी संत धरती पर कभी-कभार होते हैं । मेरा ईरान का राज्य ले लो किन्तु मेरे संत को रिहा कर दो ।
      तुर्क-सुल्तान भी आखिर इंसान था, बोला : ‘‘तुमने आज मेरी आँखें खोल दीं । संतों के वेश में खुदा से मिलानेवाले इन औलिया, फकीरों का तुम आदर करते हो तो मैं तुम्हारा राज्य लेकर इनको छोडूँ ! नहीं, आओ हम गले लगते हैं । इन संत की कृपा से हमारा वैर मिट गया ।
भाग होया गुरु संत मिलाया ।
प्रभ अविनाशी घर में पाया ।।
      जितनी देर ब्रह्मज्ञानी संतों के चरणों में बैठते हैं और वचन सुनते हैं वह समय अमूल्य होता है । उसका पुण्य तौल नहीं सकते हैं ।
तीरथ नहाये एक फल, संत मिले फल चार ।

      संत के दर्शन-सत्संग से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - चारों फल फलित होने लगते हैं । उन्हीं संत से अगर हमको दीक्षा मिली तो वे हमारे सद्गुरु बन गये । तब तो उनके द्वारा हमको अनंत फल होता है, वह फल जिसका अंत न हो, नाश न हो ।
सद्गुरु मिले अनंत फल, कहत कबीर विचार ।।

      पुण्य का फल सुख भोग के अंत हो जाता है, पाप का फल दुःख भोग के अंत हो जाता है पर संत के, सद्गुरु के दर्शन और सत्संग का फल न दुःख दे के अंत होता है न सुख दे के अंत होता है, वह तो अनंत से मिलाकर मुक्तात्मा बना देता है ।              

सेवा कैसे करें ?

सेवा कैसे करें ?
            आपके मन में दूसरों की सेवा करने की आकांक्षा अवश्य है क्योंकि आप दूसरे से सेवा लिये बिना रह भी तो नहीं सकते ! विचारणीय यह है कि आप दूसरों की कैसी सेवा करना चाहते हैं - अपने मन की पसंद की या उसके मन की पसंद की ? सुख पहुँचाना चाहते हैं या हित करना चाहते हैं ? ये दोनों अलग-अलग वस्तु हैं, कभी-कभी एक होते हैं । विवेक करना कठिन है ! अपनी वासना सेवा में जुड जाती है । आप सूक्ष्म दृष्टि से देखिये, अपने द्वारा की हुई सेवा से आप अपने को गौरवान्वित करते हैं कि नहीं ? यदि ईश्वर की, सर्वात्मा की, मानवता, समाज, जाति, मजहब, वर्ग या किसीकी भी सेवा करके आपको यह अनुभव होता है कि मैंने एक बहुत बडा काम किया तो वह सेवा दूसरे की न होकर आपकी अपनी सेवा हो जाती है । इसमें सावधान रहने की बात इतनी ही है कि सेवा में अभिमान का उदय न हो जाय ।

            विश्व बहुत बडा है । उसकी आवश्यकताएँ और माँग बहुत बडी है । आपकी सेवा समुद्र में एक सीकर (जलकण) के समान भी नहीं है । आप अपने ही भीतर बैठे हुए ईश्वर के ज्ञान, उसकी शक्ति और उसके अद्भुत क्रियाकलाप का अनुभव कीजिये । देखेंगे कि ईश्वर से अलग आपका कोई सत्त्व-महत्त्व नहीं है । आप ईश्वर के यंत्र के रूप में बस सेवा करते रहिये, परम आनंद की उपलब्धि होगी ।    

सोमवार, 20 नवंबर 2017

नोबल पीस प्राइज के लालच में हिन्दुओ का बहुत अहित कर रहे है कथित धर्मगुरु रविशंकर...

नोबल पीस प्राइज के लालच में हिन्दुओ का बहुत अहित कर रहे है कथित धर्मगुरु रविशंकर।
               राम मंदिर मामले में मध्यस्थता करने आए "बिन बुलाए मेहमान" श्री-श्री साहब की बौद्धिक संरचना पर यह लेख पढ़िए। थोड़ा लंबा जरूर है, लेकिन पढ़िए जरूर।।। जब मैं असम में था तब वहां के एक सूदूर गाँव में जाना हुआ। गाँव में अधिसंख्यक आबादी बांग्लादेशी घुसपैठियों की थी। वहां के एक छोटे से मोबाइल रिचार्ज दुकान में रिचार्ज करवाने गया तो देखा कि वहां छः-सात युवा कंप्यूटर पर एक बांग्लादेशी मौलाना की तक़रीर सुन रहे थे। तक़रीर में वो मौलाना जो बोल रहा था उसके बोल कुछ यूं थे,
               "दूसरे धर्म का कोई कैसा भी पंडित क्यों न हो हमारे ज़ाकिर नाइक के सामने नहीं टिक सकता। आपलोगों ने कुछ दिन पहले इंडिया से आई एक विडियो देखी होगी जिसमें हिन्दू धर्म के सबसे बड़े विद्वान् श्रीश्री रविशंकर को हमारे ज़ाकिर नाइक ने उठा-उठा के पटका। आप विश्वास नहीं करेंगें, जाकिर सवाल पूछते जा रहे थे और वो रविशंकर आएँ-बाएँ-साएँ बके जा रहा था। यहाँ तक कि ज़ाकिर की तक़रीर खत्म होने के बाद झुण्ड के झुण्ड लोग अल्लाह के दीन में शामिल होने आगे गये। उस दिन फिर से हक़ (इस्लाम) बातिल (हिन्दू धर्म) पर ग़ालिब आया"।
               इस विडियो को देखने के बाद उनके चेहरे खिले हुये थे। मैंने उन लड़कों से पूछा, तुमलोग जानते हो ज़ाकिर नाइक कौन है तो उनमें एक भी नहीं था जिसने इंकार में सर हिलाया हो। ये बात आपको मैं असम के नगांव जिले के एक सूदूर गाँव की बता रहा हूँ तो आप कल्पना कर सकतें हैं कि ज़ाकिर नाइक की पहुँच कहाँ तक है।
               हमारे धर्म के एक NGO चलाने वाले मॉडर्न बाबा को गुजरात दंगों के दौरान सेकुलर सर्वधर्म सम्भावी कीड़े ने काटा, बड़ी तकलीफ हुई कि इस मुल्क के अमन में ये साम्प्रदायिकता का जहर कैसे घुल सकता है और मुल्क के सेकुलर ताने-बाने को बचाने की कोशिश करते हुये उसने हिन्दू-मुस्लिम एकता को बल देने के लिये एक किताब लिखने का इरादा बाँधा। कहने की जरूरत नहीं है कि जिस इन्सान ने न तो हिन्दू धर्म को पढ़ा हो और न इस्लाम को उसकी जहालत से निकली किताब कैसी रही होगी। कुछ पीं० एनo ओक की किताब से चुराया और कुछ गूगल से उठाया और लिख डाली किताब फिर खुद को अमन का राजकुमार होने का भ्रम पालने लगा और इसी भ्रम में एक दिन उसने "इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन" को आमन्त्रण दिया कि क्यों न मैं और आपके मुखिया ज़ाकिर नाइक एक बड़ी भीड़ को संबोधित करें और हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रयासों को गति दें।
               कहने की जरूरत नहीं है कि इस मूढ़ मति के छल्ले को ये पता नहीं था कि ये जिसको आमन्त्रण देने जा रहा है वो इसकी तरह न तो ज़ाहिल है और न ही महामूर्ख। "इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन" ने देखा कि जब जाहिल बकरा खुद ही हलाल होने आ रहा है तो क्यों न उसकी बोटियाँ, चर्बी और हड्डी बांटने का पूरा इंतजाम किया जाये। इसलिये उन्होंनें फ़ौरन सारे इंतज़ामात किये और इस मूढ़मति को आमंत्रित किया।

               21 जून, 2006 को हमारे लिये कलंक दिवस के रूप में चिन्हित किया जाना चाहिये क्योंकि उस दिन बंगलौर के एक मंच पर जाकिर और ये मूढ़मति बैठे। डिबेट का विषय था "Concept of GOD in Islam and Hinduism"। ज़ाकिर नाइक ने अपने स्वभाव के अनुसार वेदों, गीता, पुराणों और उपनिषदों से सन्दर्भों की झड़ी लगा दी। कहा कि अंतिम अवतार जिसे आप कल्कि मानते हो वो हमारे नबी के रूप में हो चुके हैं और इसका वर्णन आपकी किताबों में भी है। इसके लिये भी ज़ाकिर ने हमारी ही किताबों से दलीलों का अंबार लगा दिया। अब सामने बैठी पचास हज़ार की भीड़ और टीवी पर लाइव देख रहे करोड़ों लोग सांस थामे इस इंतज़ार में थे कि ज़ाकिर के इन दावों पर ये क्या जबाब देतें हैं। ये उठे, अपना पल्लू संभाला और मंच पर जाकर कहने लगे, "मुझे ताअज्जुब है कि इनके पास इतना इल्म कैसे है और इनकी मेमोरी इतनी जबर्दस्त कैसे है"।

               इस मूढमति के छल्ले से ज़ाकिर के किसी भी सवाल का जबाब देते नहीं बना। न ही ये कुरान से एक आयत भी बोल सका और खींसे निपोरते हुये कबीर के प्रेम वाले दोहे पढ़ने लगा। ज़ाकिर इतने पर भी कहाँ पसीजने वाला था, उसके बाद उसने इसकी लिखी उस कूड़ा किताब का पोस्टमार्टम शुरू कर दिया जिसमें इसकी मूर्खता और कमअक्ली के तमाम सबूत थे। ज़ाकिर ने इसके किताब की एक-एक पेज खोली और इसे नंगा कर दिया। जब इसकी बारी आई तो इसने फिर दांत निकालते हुये कहा, "दिस बुक वाज रिटेन इन हरी" यानि इसे मैंने जल्दबाजी में लिखा था इसलिये इसमें गलतियाँ हैं पर जाकिर नाइक को समझना होगा कि मेरी मंशा पवित्र थी और मैं इस किताब के जरिये से हिन्दू और मुसलमानों को एक साथ लाना चाहता था।

               इसे बोलने के लिये पचास मिनट का समय दिया गया था और ये बमुश्किल 35 मिनट ही बोल पाया। जब कार्यक्रम खत्म हुआ तो वहाँ एक अजीब शोर बरपा था। इस मूढमति ने सनातन को शर्मसार कर दिया था और वहां ज़ाकिर के लोग विजय का जश्न मना रहे थे। IRF ने उस कार्यक्रम की संभवतः लाखों सीडियाँ बनवाई, उस विडियो को youtube से लेकर सारे इन्टरनेट पर फैला दिया और दुनिया उस मजमे में हिंदुत्व की पराजय का दृश्य देखती रही। जाकिर ने न जाने किस-किस तरीके से इस विजय को कैश किया और मतान्तरण की फसल काटी। दावतियों को नया हौसला मिला कि अब सब कुछ संभव है।

               आप कहते रहिये कि हमारे वो गुरूजी हिन्दूधर्म के प्रतिनिधि नहीं है तो वो ऐसे हैं वैसे हैं पर ज़ाकिर और IRF उसे हिंदुत्व पर इस्लाम के विजय रूप में ही चिन्हित करती है। दुनिया के लाखों हिन्दू जिनमें आपकी तरह कूटनीति समझने और समझाने लायक बुद्धि नहीं है (आपके अनुसार) वो अपने धर्म पर शर्मिंदा होतें हैं उस विडियो को देखकर और उधर असम के सूदूर गाँव तक में बैठे उन लड़कों को ज़ाकिर ये हौसला देता है कि तुम बौद्धिक युद्ध में भी इनसे कम हो क्या? देखो, कैसे हमारे नाइक ने हिन्दू धर्म के सबसे बड़े पंडित को सारी दुनिया के सामने नंगा कर दिया।

               अब कोई मुझे ये समझाए कि :-
1। आपको न तो अपने धर्म का इल्म है और न ही उनके तो आप किस हैसियत से इन विषयों पर डिबेट करने जातें हैं?
2। आप अपने NGO के प्रतिनिधि बनकर कुछ भी करते रहें कोई हर्ज़ नहीं पर हिन्दू धर्म का प्रतिनिधि आप किस हैसियत से बन जातें हैं?
3। सेकुलर कीड़ा एकतरफ़ा आपको ही क्यों काटता है?
4। आपकी समझदानी भेड़ और भेड़िये में फ़र्क क्यों नहीं कर पाती? और अंतिम सवाल केवल उस मूढमति के छल्ले "डबल श्री" से है कि एक बार नंगा होकर मन नहीं भरा जो बार-बार अपनी नथ उतराई करने आगे आ जाते हो?

               अब क्या हमारे दिन इतने खराब आ गयें हैं कि नाक कटवाने वाले को हम अपने नाक और अस्मिता की लड़ाई सौंप दे?दलाली बंद करो, अपने साबुन-सर्फ़, मूंग दाल, ब्रश-पेस्ट बेचो वरना नंगा करना अकेले ज़ाकिर को ही थोड़े आता है।।। भाई Abhijeet Singh की धधकती कलम से निकला लेख।।।

               ये वही श्रीश्री रविशंकर हैं जो बुरहान वानी जैसे आतंकी के बाप को सांत्वना देने जाते हैं लेकिन किसी सैनिक के मौत पर मौन हो जाते हैं। ये वही श्रीश्री रविशंकर हैं जो इराक सिरिया में मुल्लों के मारे जाने पर शांति करवाने जाते हैं लेकिन कश्मीर, केरल में हिंदुओं की हत्या पर इन्हे सांप सूंघ जाता है। इनका नाम श्रीश्री रविशंकर के बजाय , छि: छि: रवि-कंकर होना चाहिए । जय श्री राम

शनिवार, 11 नवंबर 2017

धर्म या छल-धर्म ?

धर्म या छल-धर्म ?

            कैकेयी ने राजा दशरथ से दो वरदान माँगे । पहला, रामजी को चौदह वर्षों का वनवास और दूसरा, भरत को राज्य मिले । यह सुनते ही राजा व्याकुल हो गये ।

            दशरथजी बोले : ‘‘कैकेयी ! मेरे लिए तो भरत और राम दो आँखों की तरह हैं । क्या किसी व्यक्ति के मन में यह कल्पना आ सकती है कि मेरी एक आँख ठीक रहे और दूसरी ठीक न रहे ? इसी प्रकार मेरे अंतःकरण में राम और भरत में कोई अंतर नहीं । तुम अगर भरत को राज्य देना चाहती हो तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है लेकिन मुझे तो आश्चर्य यह है कि आज तक तुमने मुझसे राम के विषय में यही कहा कि राम तो बडे साधु हैं लेकिन उन्हीं राम को किस अपराध के कारण वनवास दे रही हो ?

            कैकेयी ने जो उत्तर दिया वही मानो धर्म के साथ छल है ।

            कैकेयी : ‘‘महाराज ! विचार मेरा नहीं, आपका बदला है । मैं तो अपनी जगह पर दृढ हूँ । मैं पहले भी राम को साधु मानती थी, अब भी मानती हूँ ।

            दशरथजी : ‘‘यदि ऐसा है तो फिर राम को वन में भेजकर अनर्थ क्यों कर रही हो ?

            ‘‘अनर्थ मैं कर रही हूँ कि आप कर रहे हैं ? मैं राम को साधु समझती हूँ इसीलिए तो वन भेज रही हूँ । आप अनर्थ कर रहे हैं कि साधु को सिंहासन पर बैठाकर उसे बदलना चाहते हैं । मैंने तो बडा सुंदर न्याय किया है जो तप करने के लिए राम को वन में भेज रही हूँ । आज तो आपको यह अवसर मिला है जिसके द्वारा अयोध्या में सत्य, तप, दया और दान - धर्म के चारों चरण पूरे हो जायेंगे ।

            दशरथजी : ‘‘कैसे ?

            कैकेयी : ‘‘आपने मुझे वचन दिया था कि जो माँगोगी वह मिलेगा । आप वचन को पूरा करेंगे तो धर्म के पहले चरण सत्य की रक्षा हो जायेगी । राम वन में जाकर तप करेंगे तो दूसरा चरण तप पूरा हो जायेगा । भरत को राज्य का दान देंगे तो तीसरा चरण दान पूरा हो जायेगा और धर्म का चौथा चरण दया है तो आप दया मेरे ऊपर कीजिये ।

            इस प्रकार सत्य, तप, दया और दान - चारों की रक्षा होनेवाली है । मैं तो धर्म की रक्षा के लिए ही यह सब कुछ कर रही हूँ और बँटवारा कितना बढ़िया किया है !


            ‘सत्य का पालन दशरथ करें, तपस्या राम करें एवं दया और दान हमें मिलें । इसका अभिप्राय है कि हम यह चाहते हैं कि धर्म में जितनी त्याग की बातें हों वे दूसरों के जीवन में आयें और जितनी भोग या उपलब्धि की बातें हैं वे हमारे जीवन में आयें । जीवन में तप श्रेष्ठ है मगर दूसरे का लडका करे और जो भोग है वह तो हमारे लडके को मिले । यदि इस प्रकार धर्म का बँटवारा किया जाय तो यह धर्म नहीं अपितु धर्म के साथ छल होगा और कैकेयी ने यही छल किया । क्या ऐसे छल से किसीको भी सुख मिल पाया है ?