गुरुवार, 12 अक्तूबर 2017

संकल्प शक्ति का विकाश कैसे करें ?

संकल्प शक्ति का विकाश कैसे करें ?

     संकल्प का शुद्ध और अप्रतिहत(अखंडित) अभ्यास किया जाय तो अद्भुत कार्य भी सिद्ध किये जा सकते हैं । बलवती इच्छावाले व्यक्ति के लिए इस संसार में कुछ भी असंभव नहीं है । वासना से संकल्प अशुद्ध और निर्बल हो जाता है । इच्छाओं को वश में करने से संकल्पशक्ति बढ़ती है । इच्छाएँ जितनी कम हों संकल्प उतना ही बलवान होता है । मनुष्य के भीतर कई प्रकार की मानसिक शक्तियाँ हैं, जैसे धारणाशक्ति, विवेकशक्ति, अनुमानशक्ति, मनःशक्ति, स्मृतिशक्ति, प्रज्ञाशक्ति आदि । ये सभी संकल्पशक्ति के विकसित होने पर पलक मारते ही काम करने लग जाती है ।

     ध्यान का नियमित अभ्यास, सहिष्णुता, विपत्तियों में धैर्य, तपस्या, प्रकृति-विजय, तितिक्षा, दृढ़ता तथा सत्याग्रह और घृणा, अप्रसन्नता व चिड़चिड़ाहट का दमन ये सब संकल्प के विकास को सुगम बनाते हैं । धैर्यपूर्वक सबकी बातें सुननी चाहिए । इससे संकल्प का विकास होता है तथा दूसरों के हृदय को जीता जा सकता है ।

      विषम परिस्थितियों की शिकायत कभी न करें । जहाँ कहीं आप रहें और जहाँ कहीं आप जायें, अपने लिए अनुकूल मानसिक जगत का निर्माण करें । सुख और सुविधाओं के उपलब्ध होने से आप मजबूत नहीं बन सकते । विषम और अनुपयुक्त वातावरण से भागने का प्रयत्न न करें । भगवान ने आपकी त्वरित उन्नति के लिए ही आपको वहाँ रखा है । अतः सभी परिस्थितियों का सदुपयोग करें । किसी भी वस्तु से अपने मन को उद्विग्न न होने दें । इससे आपकी संकल्पशक्ति विकास होगा । प्रत्येक स्थान व अवस्था में अपनेको प्रसन्न रखने का स्वभाव बनायें । इससे आपके व्यक्तित्व में बल औ तेज उतरेगा ।

      मन की एकाग्रता का अभ्यास संकल्प की उन्नति में सहायक है । मन का क्या स्वभाव है इसका अच्छी तरह से ज्ञान प्राप्त कर लें । मन किस तरह इधर-उधर घूमता है और किस प्रकार अपने सिद्धांतों का प्रतिपादन करता है यह सब भली-भाँति हृदयंगम कर लें । मन के चलायमान स्वभाव को वश में करने के लिए आसान और प्रभावकारी तरीके खोज लें । व्यर्थ की बातचीत सदा के लिए त्याग दें । सभीको समय के मूल्य का ज्ञान होना चाहिए । संकल्प में तेज तभी निखरेगा, जब समय का उचित उपयोग किया जाय । व्यवहार और दृढ़ता, लगन व ध्यान, धैर्य तथा अप्रतिहत प्रयत्न, विश्वास और स्वावलम्बन आपको अपने सभी प्रयासों में सफलता प्राप्त करायेंगे ।

      आपको अपने संकल्पों का व्यवहार योग्यतानुसार करना चाहिए, अन्यथा संकल्प क्षीण हो जायेगा, आप हतोत्साहित हो जायेंगे ।

अपना दैनिक नियम अथवा कार्य-व्यवस्था अपनी योग्यता के अनुसार बना लें और उसका सम्पादन नित्य सावधानी से करें । अपने कार्यक्रम में पहले-पहल कुछ ही विषयों को सम्मिलित करें । यदि आप अपने कार्यक्रम को अनेकों विषयों से भर देंगे तो न उसे निभा सकेंगे और न लगन के साथ दिलचस्पी ही ले सकेंगे । आपका उत्साह क्षीण होता जायेगा । शक्ति तितर-बितर हो जायेगी । अतः आपने जो कुछ करने का निश्चय किया है, उसका अक्षरशः पालन प्रतिदिन करें ।

      विचारों की अधिकता संकल्पित कार्यों में बाधा पहुँचाती है । इससे भ्रांति, संशय और दीर्घसूत्रता का उदय होता है । संकल्प की तेजस्विता में ढीलापन आ जाता है । अतः यह आवश्यक है कि कुछ समय के लिए विचार करें फिर निर्णय करें । इसमें अनावश्यक विलम्ब न करें । कभी-कभी सोचते तो हैं पर कर नहीं पाते । उचित विचार और अनुभवों के अभाव में ही यह हुआ करता है । अतः उचित रीति से सोचना चाहिए और उचित निर्णय ही करना चाहिए, तब संकल्प की सफलता अनिवार्य है । किंतु केवल संकल्प ही किसी वस्तु की प्राप्ति में सफल नीं होता । संकल्प के साथ निश्चित उद्देश्य को भी जोड़ना होगा । इच्छा या कामना तो मानस-सरोवर में एक छोटी लहर-सी है परंतु संकल्प वह शक्ति है जो इच्छा को कार्यरूप में परिणत कर देती है । संकल्प निश्चय करने की शक्ति है ।

     जो मनुष्य संकल्प-विकास की चेष्टा कर रहा है, उसे सदा मस्तिष्क को शांत रखना चाहिए । सभी परिस्थितियों में अपने मन का संतुलन कायम रखना चाहिए । मन को शिक्षित तथा अनुशासित बनाना चाहिए । जो व्यक्ति मन को सदा संतुलित रखता है तथा जिसका संकल्प तेजस्वी है, वह सभी कार्यों में आशातीत सफलता प्राप्त करेगा ।


      अनुद्विग्न मन, समभाव, प्रसन्नता, आन्तरिक बल, कार्य-सम्पादन की क्षमता, प्रभावक व्यक्तित्व, सभी उद्योगों में सफलता, ओजपूर्ण मुखमंडल, निर्भयता आदि लक्षणों से पता चलता है कि संकल्पोन्नति हो रही है ।

सच्चा पुरुषार्थ।

सच्चा पुरुषार्थ।

          कई बार प्रयत्न करने पर  भी असफलता मिले, फिर भी अपना पुरुषार्थ न छोड़े ऐसा कृतनिश्चयी साधक जीवन में अवश्य सफलता पाता है ।
          साधक के जीवन में कभी ऐसा भी अवसर आता है कि उसे अपने चारों ओर निराशा का गहन अंधकार छाया हुआ दिखाई देता है । अपने दिल की बात कहकर अपना दिल खाली कर सके ऐसा मौका नहीं मिलता है । फिर भी यदि उसका पुरुषार्थ शुभ के लिए होता है तो प्रकृति की कोई घटना उसके जीवन में पुनः आशा एवं उत्साह का संचार कर देती है ।
          सिद्धार्थ के जीवन में भी एक बार ऐसा प्रसंग आया था । ईश्वरप्राप्ति के लिए सिद्धार्थ ने पत्नि-पुत्र, राज-पाट तक का त्याग करके जंगल का रास्ता पकड़ा था । कई प्रकार की साधनाएँ की थीं, किन्तु लक्ष्य हासिल नहीं हो रहा था । सिद्धार्थ निराश होकर सोच ही रहे थे कि इसमें तो अच्छा है कि घर चला जाऊँ....इतने में एकाएक उनकी निगाह पेड़ पर चढ़ते हुए एक नन्हें-से कीड़े पर पड़ी । उन्होंने देखा कि पेड़ पर चढ़ता हुआ कीड़ा वायु के झोंके से नीचे गिर पड़ा । वह फिर से चढ़ने लगा तो फिर गिर पड़ा.... ऐसा करते-करते वह दस बार चढ़ा और गिरा किन्तु फिर भी उसने प्रयन्त नहीं छोड़ा और आखिरकार ग्यारहवीं बार चढ़ ही गया ।
      यह दृश्य देखकर सिद्धार्थ को लगा कि यह मात्र एक सामान्न दृश्य ही नहीं वरन् मेरे लिए एक ईश्वरीय संकेत है। एक छोटा-सा कीड़ा दस-दस बार प्रयत्न करने पर भी नहीं हारता है और सफलता प्राप्त करके ही दम लेता है तो मैं क्यों अपना लक्ष्य छोड़कर कायरों की नाईं भागकर नश्वर राज्य सँभालूँ?’
          सिद्धार्थ पुनः दृढ़ता से लग गये तो लक्ष्य को पाकर ही रहे । वे ही सिद्धार्थ आज भी गौतम बुद्ध के नाम से लाखों-करोड़ों हृदयों द्वारा पूजे जा रहे हैं ।
          यदि तुम्हारा पुरुषार्थ शास्त्र-सम्मत हो, सद्गुरु द्वारा अनुमोदित हो, लक्ष्य के अनुरूप हो तो सफलता अवश्य मिलती है । पुरुषार्थ तो कई लोग करते हैं ।
          सुनी है एक कहानी एक बार चूहों की सभा हुई । चूहों के आगेवान ने कहाः पुरुषार्थ ही परम दैव है । पुरुषार्थ से ही सफलताएँ मिलती हैं । अतः अब हमें निराश होने की कोई जरूरत नहीं है । जाओ, तुम सब पुरुषार्थ करके कुछ ले आओ । कोई भी खाली हाथ न आये ।
          सब चूहे सहमत हो गये औ दौड़ पड़े । एक चूहा मदारी के घर में घुस गया और एक बाँस की पिटारी को कुतरना आरंभ किया । वह बाँस की पिटारी इतनी सख्त थी कि कुतरते-कुतरते चूहे के मुँह से खून बह निकला, फिर भी उसने अपने पुरुषार्थ नहीं छोड़ा । प्रभात होने तक बड़ी मुश्किल से एक छेद कर पाया । जैसे ही चूहा पिटारी में घुसा तो रातभर के भूखे सर्प ने उस चूहे को अपना ग्रास बना लिया ।
      ठीक इसी तरह मूर्ख, अज्ञानी मनुष्य भी सारा जीवन नश्वर वस्तुओं को पाने के पुरुषार्थ में लगा देते हैं । किंतु अंत में क्या होता है ? कालरूपी सर्प आकर चूहेरूपी जीव को निगल जाता है । ऐसे पुरुषार्थ से क्या लाभ ?
      शास्त्र कहता है : पुरुषार्थ अर्थात् पुरुषस्य अर्थः इति पुरुषार्थ । परम पुरुष परब्रह्म परमात्मा के लिए जो यत्न किया जाता है वही पुरुषार्थ है । फिर चाहे जप-तप करो, चाहे कमाओ-खाओ और चाहे बच्चों की परवरिश करो... यह सब करते हुए भी तुम्हारा लक्ष्य, तुम्हारा ध्यान यदि अखंड चैतन्य की ओर है तो समझो कि पुरुषार्थ सही है । किन्तु यदि अखंड को भूलकर तुम खंड-खंड में, अलग-अलग दिखनेवाले शरीरों में उलझ जाते हो तो समझो कि तुम्हारा पुरुषार्थ करना व्यर्थ है ।
      पुरुषार्थ तो सभी कर रहे हैं । आज तक हम सभी पुरुषार्थ करते ही आये हैं । ईश्वर ने हमको बुद्धिशक्ति दी है किन्तु उसका उपयोग हमने जगत के संबंधों को बढ़ाने में किया । ईश्वर ने हमें संकल्पशक्ति दी है किन्तु उसका उपयोग हमने जगत के व्यर्थ संकल्प-विकल्पों को बढ़ाने में किया । ईश्वर ने हमें क्रियाशक्ति दी है किन्तु उसका उपजोग भी हमने जगत की नश्वर वस्तुओं को पाने में ही किया है ।
      किसीसे पूछो कि ऐसे पुरुषार्थ से क्या पाया ?’ तो वह कहेगाः मैंने पुरुषार्थ किया । परीक्षा के दिनों में सुबह चार बजे उठकर पढ़ता था । मैं बी.ए. हो गया.... मैं एम. ए. हो गया... बढ़िया नौकरी मिल गयी । फिर नौकरी छोड़कर चुनाव लड़ा तो उसमें भी सफल हो गया और आज तक साधारण परिवार का लड़का पुरुषार्थ करके मंत्री बन गया...
      फिर आप पूछो कि भाई ! अब आप सुखी तो हो ?’ तो जबाव मिलेगा कि और सब तो ठीक है लेकिन लड़का कहने में नहीं चलता है तो फिक्र होती है.... रात को नींद नहीं आती है....
      यह क्या पुरुषार्थ का वास्तविक फल है ? बी.ए. एम. ए करने की, पीएच.डी. करने की, चुनाव लड़ने की मनाही नहीं है किन्तु यह सब करने के साथ आप एक ऐसे पद को पाने का भी पुरुषार्थ कर लो कि जिसे पाकर यदि आपकी सब धारणाएँ, सब मान्यताएँ विपरीत हो जाएँ, सारी खुदाई तुम्हारे विरेध में खड़ी हो जाय, फिर भी आपके दिल का चैन न लूटा जा सके, आपका आनंद रत्तीभर भी कम न हो सके । ...और वह पद है आत्मपद जिसे पाकर मानव सदा के लिए सब दुःखों से निवृत्ति हो जाता है, जन्म-मरण के चक्र से सदा के लिए पार हो जाता है और दुनिया का बड़े-से-बड़ा कष्ट, दुनिया का बड़े-से-बड़ा विरोध भी उसे कोई हानि नहीं पहुँचा सकता है ।
      आप आनंद पाने के लिए साज तो बजाते हो, गीत भी गाते हो लेकिन गीत परमात्मा के लिए गा रहे हो कि संसार के लिए इस बात का जरा ख्याल रखना । परमात्मा के लिए किया गया हर कार्य पुरुषार्थ हो सकता है किन्तु सांसारिक इच्छा को लेकर की गयी परमात्मा की पूजा भी वास्तविक पुरुषार्थ नहीं हो सकती है ।
          बेटे-बेटी को जन्म देना, पाल-पोसकर बड़ा करना, पढ़ाना-लिखाना एवं अपने पैरों पर खड़ा कर देना... बस, केवल यही पुरुषार्थ नहीं है । इतना तो चूहा, बिल्ली आदि प्राणी भी कर लेते हैं । किन्तु बेटे-बेटी को उत्तम संस्कार देकर परमात्मा के मार्ग पर अग्रसर करना और खुद भी अग्रसर होना- यही सच्चा पुरुषार्थ है ।
          वेदान्त की नजर से, शास्त्रों की नजर से देखा जाय तो पुरुषार्थ का वास्तविक फल यही है कि पूरी त्रिलोकी का राज्य तुम्हें मिल जाय फिर भी तुम्हारे चित्त में हर्ष न हो और पडोसी तुम्हें नमक की एक डली तक देने के ले तैयार न हो इतने तुम समाज में ठुकराये जाओ, फिर भी तुम्हारे चित्त में विषाद न हो ऐसे एकरस आत्मानंद में तुम्हारा चित्त लीन रहे... यही सच्चा पुरुषार्थ है । भोलेबाबा कहते हैः

देहादि करते कार्य हैं, आत्मा सदा निर्लेप है ।
यह ज्ञान सम्यक होय जब, होता न फिर विक्षेप है ।।
मन इन्दियाँ करती रहें, अपना न कुछ भी स्वार्थ है ।
जो आ गया सो कर लिया, यह ही परम पुरुषार्थ है ।।
नहीं जागने में लाभ कुछ, नहीं हानि कोई स्वप्न से ।
नहीं बैठने से जाय कुछ, नहीं आये हैं कुछ यत्न से ।।
निर्लेप जो रहता सदा, सो सिद्ध मुक्त कृतार्थ है ।
नहीं त्याग हो नहीं हो ग्रहण, यह ही परम पुरुषार्थ है ।।

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वास्तु दोष कैसे पहचाने ?


वास्तु दोष कैसे पहचाने ?

                              भवन निर्माण एवं वास्तु विज्ञान दो अलग अलग विषय हैं। एक व्यक्ति अपने मनोनुकूल गृह का निमार्ण तो करवा सकता है अपने आर्किटेक्ट या डिज़ाइनर से कहकर उसे अच्छी प्रकार से सजा भी सकता है परन्तु वह उसमें रहने पर सुखी जीवन व्यतीत करेगा यह आवश्यक नहीं। एक आर्किटेक्ट भी जिसे केवल भवन निर्माण तकनीक का ज्ञान है उस व्यक्ति के सुखी व मंगलमय जीवन की गारंटी कैसे ले सकता है परन्तु वास्तु विज्ञान एवं वास्तु के अनुरूप मकान का निर्माण करने से वास्तु विशेषज्ञ द्वारा गारंटी ली जा सकती है। 
                  आज के युग में अपने लिए घर बनाना एक बहुत ही बड़ी उपलब्धि है जो की उसके परिवार के लिए एक बड़े अनुष्ठान की तरह होती है। गृह प्रवेष सही मुहूर्त में सभी प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान करने के पष्चात् भी किया जाता है परन्तु सभी प्रकार की पूजा अनुष्ठान आदि करने के पष्चात् भी अनेकों बार यह देखने को मिलता है कि एक मकान छोड़कर जाने से तथा दूसरे मकान में रहने से एक ही परिवार की सुख शांति का हनन हो जाता है। मनुष्य यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि पहले मकान में ऐसा क्या था। मैं उसमें सुखी व सन्तुष्ट था तथा धन संग्रह कर अपना स्वयं का घर बनाया तो- मैं संकटों से घिर गया ! यहाँ उस मकान की वास्तु का बहुत अधिक प्रभाव उस के पारिवारिक जीवन पर होता है परन्तु अब प्रष्न यह उठता है कि कैसे जाने की जिस भवन में हम रह रहें हैं उसकी वास्तु हमारे अनुरूप है घ् यदि अनुरूप है तो वह हमारे तथा हमारे परिवार के लिये लाभकारी होगा क्या! यह लाभकारी निम्नलिखित में से किसी भी रूप में हो सकता है:-
·        भवन में रहने से धर्मलाभ होना चाहिए तथा उस भवन में रहने वाले प्राणी को अध्यात्मिक एवं आत्मिक सुख की अनुभूति होनी चाहिए।
·        दैविक एवं भौतिक उपसर्गों से मुक्ति मिलनी चाहिए।
·        समाज में मान-सम्मान बढ़ना चाहिए।
·        परिवार के दूसरे सदस्य भी सुखषांति का अनुभव करें तो समझना चाहिए की उस भवन की वास्तु गृहस्वामी केे अनुरूप है।
·        गृहस्वामी के व्यवसाय में उन्नति हो, उसके धन धान्य में वृद्धि हो।
·        यदि गृह स्वामी कर्जदार है और उसका कर्ज धीरे धीरे कम होना आरम्भ हो गया है तो इसे भी शुभ संकेत माना जाता है।
·        गृहस्वामी की आय के साधनों में वृद्धि हो।
·        यदि परिवार के सदस्य गृहस्वामी की आज्ञा में रहने लगें तो यह भी यही दर्षाता है कि भवन की वास्तु गृहस्वामी के अनुकूल है।
·        परिवार के सदस्य यदि अध्यात्मिक एंव आत्मिक उन्नति करने लगें और मोक्षमार्ग का रास्ता प्रषस्त हो तो इसमें ही वास्तुषास्त्र की सार्थकता है।
                                  अब देखते हैं कि घर की वास्तु अनुरूप न होने के कारण कुटुम्बजनों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।
·        परिवार में झगड़ा व कलह आरंम्भ हो जाता है।
·        व्यय व्यर्थ ही बढ़ जाता है।
·        आमदनी में कमी हो जाती है।
·        गृह स्वामी आर्थिक रूप से निर्बल हो जाए तो समझें उस घर की वास्तु अनुकूल नहीं है।
·        कोर्ट केस हो जाए व्यक्ति को मानसिक तनाव रहे तो समझें की घर में वास्तु दोष है।
·        गृहस्वामी का सम्मान समाज में कम होने लगें।
·        सन्तति का नाष हो या फिर उसके बच्चे व कुटुम्बजन उसकी आज्ञा का पालन न करें तो समझें की घर में वास्तुदोष है।
·        परिवार में अकाल मृत्यु भी वास्तुदोष की सूचक है।
·        अक्समात् परिवार के सदस्यों को कोई रोग घेर ले तो समझें की भवन की वास्तु अनुकूल नहीं।
                                यदि लगे की घर में कुछ भी उपरोक्त में से घट रहा है तो समझ लेना चाहिए की भवन में वास्तुदोष है और उसके निवारण हेतु यथा सम्भव वास्तुदोष निवारण के उपाय करने चाहिएँ।
(पं0 दयानन्द शास्त्री)


जन्म- कुण्डली का क्यों करते हें मिलान ?

जन्म- कुण्डली का क्यों करते हें मिलान ???????

                                            प्राचीन भारतीय संस्कृति में युवक-युवतियों को विवाह पूर्व मिलने-जुलने की अनुमति नहीं थी. माता- पिता अच्छा वर और खानदान देखकर उसका विवाह कर देते थे, लेकिन वर और कन्या की जन्म-कुण्डलियों का मिलान करवाना अत्यावश्यक समझा जाता था. समय के साथ स्थिति बदली है. आज हर क्षेत्र में युवक-युवती कंधे से कंधा मिलाकर कार्य करते हैं. यही कारण है कि प्रेम-विवाह आम हो गए हैं और जन्म-कुण्डली के मिलान की आवश्यकता लगभग गौण होती जा रही है.
                                            परन्तु आज भी अनेक लोग विवाह पूर्व भावी दंपती की जन्म-कुण्डली मिलवाना आवश्यक समझते है. ताकि विवाहोपरांत वर कन्या अपना गृहस्थ जीवन निर्विध्न गुजार सके.
क्या मिलाया जाता है ?????
                                           वैवाहिक सम्बन्धों ती अनुकूलता के परिक्षण के लिए ऋषि-मुनियों ने अनेक ग्रन्थ की रचना की,जिनमें वशिष्ठ,नारद,गर्ग आदि की सन्हीताएं,मुहुर्तमार्तण्ड,मुहुर्तचिन्तामणि और कुण्डलियों में वर्ण,वश्य,तारा,योनि,राशि,गण,भकूट एवं नाडी़ आदि अष्टकूट दोष अर्थात् आठ प्रकार के दोषों का परिहार अत्यन्त आवश्यक है.वर-कन्या की राशियों अथवा नवमांशेशों की मैक्त्री तथा राशियों नवमांशेशियों की एकता द्वारा नाडी़ दोष के अलावा शेष सभी दोषों का परिहार हो जाता है.इन सभी दोषों में नाडी़ दोष प्रमुख है,जिसके परिहार के लिए आवश्यक है कि वर-कन्या की राशि एक ओर नक्षत्र भिन्न-भिन्न हो अथवा नक्षत्र एक ओर राशियां भिन्न हो.
——कितने गुण मिलने चाहिए ????
                                       शास्त्रानुसार वर-कन्या के विवाह के लिए 36 गुणों में से कम से कम सा़ढ़े सोलह गुण अवश्य मिलने चाहिए, लेकिन उपरोक्त नाडी़ दोष का परिहार बहुत जरुरी है. अगर नाडी़ दोष का परीहार ना हो, तो अठाईस गुणों के मिलने पर भी शास्त्र विवाह की अनुमति नहीं देते हैं. बहुत आवश्यक हो, तो सोलह से कम गुणों और अष्टकूट दोषों के अपरिहार की स्थिति में भी कुछ उपायों से शान्ति करके विवाह किया जा सकता है. इस स्थिति में कन्या का नाम बदल कर मिलान को अनुकूल बनाना अशास्त्रीय है.
——क्या होता मांगलिक दोष ?????

                                         शास्त्रानुसार कुज या मंगल दोष दाम्पत्य जीवन के लिए विशेष रुप से अनिष्टकारी माना गया है. अगर कन्या की जन्म-कुण्डली में मंगल ग्रह लग्न, चन्द्र अथवा शुक्र से 1, 2, 12, 4, 7 आठवें भाव में विराजमान हो, तो वर की आयु को खतरा होता है. वर की जन्म-कुण्डली में यही स्थिति होने पर कन्या की आयु को खतरा होता है. मंगल की यह स्थिति पति-पत्नी के बीच वाद-विवाद और कलह का कारण भी बनती है. जन्म-कुण्डली में वृहस्पति एवं मंगल की युति अथवा मंगल एवं चन्द्र की युति से मंगल दोष समाप्त हो जाता है. इसके अतिरिक्त कुछ विशेष भावों में भी मंगल की स्थिति के कुज दोष का कुफल लगभग समाप्त हो जाता है. यह अत्यन्त आवश्यक है कि कुजदोषी वर का विवाह कुजदोषी कन्या से ही किया जाए, इससे दोनों के कुजदोष समाप्त हो जाते हैं और उनका दाम्पत्य जीवन सुखी रहता है।

सनातन धर्म को जानें।